| ।। जाँति पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।।
| आत्मीय महानुभाव,
* जय जय सियाराम । ) 0 2 (6) 20, परमप्रभु श्रीरामजी की असीम अहेतुकी अनुकम्पा एवं प्रेरणा तथा भक्तजनों के प्रबल पुण्य के बल से इस वर्ष सगुण तथा निर्गुण रामभक्तिधारा एवं श्रीसम्प्रदाय (रामावत) के मूल आचार्यपीठ श्रीमठ पर विराजमान जगदगुरू रामानन्दाचार्य पदप्रतिष्ठित रामनरेशाचार्य जी महाराज अनादिकाल से संतों ऋषियों एवं आचार्यों की तप तथा आराधना की उर्वरा भूमि आबूपर्वत पर विराजमान-रामावतार-श्रीसम्प्रदाय के मध्यमाचार्य रामानन्दाचार्य जी के द्वारा प्रतिष्ठित अनुपम सुन्दरता-आकर्षण एवं परममंगलमयता से मण्डित सर्वेश्वरश्रीरघुनाथजी की चरणछाया में अपने व्रतानुष्ठान को सम्पादित करेंगे । मेघ के समान संत सतत् अपनी आध्यात्मिक उर्जा को पक्षपातरहित एवं निष्कामभाव से विचरण करते हुये वितरित करते हैं तभी तो उन्हें भगवद समानता प्राप्त है।संसार का कोई भी प्रशासन,संगठन व व्यक्ति कभी भी ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि वह निष्काम नहीं तथा अक्षयशक्ति से मण्डित नहीं है। चातुर्मास्यकाल संतों की यायावरी वृत्ति से सर्वथा विपरीत होता है। निरंतर वृष्टि एवं नदी-नालों का उफनता हुआ भयंकर स्वरूप विचरण साधना को बाधित करते हैं, इसके साथ विशिष्ट उर्जा संचय एवं व्यापक प्रेरणा के लिये देश एवं काल का स्थायित्व भी नितांत अपेक्षित है। वैदिक सनातन धर्म की अनुपम अनादि एवं सुदृढ़ मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास्यकाल सर्वपालक भगवान् विष्णु का शयनकाल है।अतएव भगवदस्वरूप संतजन विचरण विरहित होकर सम्पूर्ण संयम-समर्पण तथा निष्ठा से शक्ति का अर्जन करते हुये सर्वश्रेष्ठ मानव समाज को परम उत्कर्ष प्रदान करते हैं।इन्हीं उत्प्रेरक भावों को ध्यान में रखते हुये चातुर्मास्य महायज्ञ समायोजन की परमोदत्त परम्परा है, जिसका सविधि परिपालन आचार्यश्री करते रहे हैं।
| “पक्षो वै मासः” इस आप्तवचन को आधार मानकर सनातन धर्म में अभी चार पक्षों ( चार मासों) का ही चातुर्मास्य महायज्ञ सम्पादन अधिकांशरूप से नियोजित हो रहे हैं, ऐसा ही आचार्यश्री भी करेंगे।
आइये इस महायज्ञ में पूर्ण शक्ति-निष्ठा एवं समर्पण से सम्मिलित होकर सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन को परमफलश्रीरामसादृश्य से मण्डित करें ।
|चातुर्मास का माहात्म्य ||
चातुर्मास का शाव्दिक अर्थ है प्रत्येक चार मास में अनुष्ठेय यज्ञ ये चार मास क्रमशः आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन से प्रारम्भ होते है | लोक में चातुर्मास्य की प्रसिद्धि आषाढ़ से आरम्भ होने बाले चार मासों में किये जाने बाले यज्ञकर्म ब्रतानुष्ठान और तपश्चरण विषयक ही है। यह चातुर्मास्य इसलिए भी प्रभावी है की आषाढ़ से आरम्भ होने बाले चार महीने आषाढ़ ,श्रावण ,भाद्रपद और आश्विन वर्षा के है और वर्षा के दिनों में प्राचीन काल में होने बाली साधू संतो सन्यासियों की धर्मपद यात्राये रुक जाती थीं वैसे ही जेसे राजाओं की विजय सैन्य यात्राये ।तब तब वर्षा के दिनों में महात्मा -साधू -संत सन्यासी अपने मूल आश्रम (स्थान)से अन्यत्र इन चार मासों में नियत बास करते हुए जो व्रतानुष्ठान करते हैं।उसे ही लोक में चातुर्मास के रूप में जाना जाता हैं। चातुर्मास भगवान विष्णु के शयन काल में होता है ।लोक का पालन संरक्षण करने बाले भगवान विष्णु जब शयन करते है तब उनके इस अधिकार का दायित्व भू-देवोँ पर आ जाता हैं और वे महात्मा भूदेव (विप्र,साधू,संत) चातुर्मास ब्रतानुष्ठन करते हूए जो पुण्य अर्जित करते है उसी से लोक का पालन होता है ।शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है__
- सन्यासी मोकभुत्त्यर्थं तपश्चारति निःस्पृहः | महात्मा सततं पुण्ये चातुर्मास्ये विशेषतः|
- सम्भूतं तपसा तेजः आत्मर्थं तन्महियते| प्रयत:सकलं लोकमचारेण पुनाति वै|
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काम्य कर्मों का परित्याग कर लोगहित में निःस्पृह होकर संत या सन्यासी सदैव तपश्चरण करता है और पवित्र चातुर्मास में उसकी तपश्चर्या ,ब्रतनिष्ठा और भी बड़जाती है सन्तों की प्रकृति बादलों की भाँति यायावरी होती है वह चातुर्मास्य काल में तप एवम् अनुष्ठान के माध्यम से उसी प्रकार पूण्य शक्ति अर्जित करते है -जैसे बादल जल संग्रह करते है और बाद में यायावर की भाँति घूमकर उसकी वर्षा करते है ।संत तपस्या से संचित की गई ऊर्जा से आत्मकल्याण तो करते ही है, अपने सदाचार से समस्त जीवलोक को पवित्र करते है ।इस प्रकार चातुर्मास ब्रतानुष्ठान का अनिवर्चनीय महात्यम् है।
चातुर्मास्य में महात्माओं को इन चारों महीनों में निष्ठापूर्वक व्रत पालन करने के लिए शुभसंकल्प से युक्त होकर नियमों को ग्रहण करना पड़ता है ।भगवान विष्ष्णु की प्रीति के लिए व्रतीजन यज्ञ तप स्वाध्याय का नियमपूर्वक विधिसम्मत नित्य पालन करते है। श्रीहरि के सायनकाल में चातुर्मास व्रतपारायण होकर प्रति दिवस सूर्य का दर्शन करके अथवा रात्रि में नक्षत्रों का दर्शन करके एक बार भोजन करने से व्रती का तेज बल बढ़ता है और उसकी कीर्ति सकल लोक में व्याप्त होती है ।अपने हाथों में फल लेकर भगबान विष्णु का ध्यान करते हुए उनकी 108 प्रदक्षिणा पूरी करके समक्ष खड़ा होकर जो ‘पुरुषसूक्त’ का जप करता हैं उसे पूर्वकृत पापों से तो मुक्ति मिलती ही हैं साथ में वह लोकोत्तर पूण्य का भागी भी होता है चातुर्मास्य व्रतानुष्ठान के पश्चात् कार्तिक मास में सदाचारी वेदज्ञ ब्राह्मणों को मिष्ठान भोजन कराने से चातुर्मास्य का अनुष्ठान पूर्ण सफल होता है ।
“पक्षो वै मास:” इस धर्मशास्त्र के अनुसार चारपक्षों को चार माह मानकर आषाढ़ पूर्णिमा से भाद्रपद पूर्णिमा तक सनातन धर्म के आचार्यगण चातुर्मास्य व्रत का अनुष्ठान करते है।उसी परम्परानुसार पूज्य जगद्गुरु आचार्यप्रवर स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज चातुर्मास्य व्रतानुष्ठान का सम्पादन करते हैं।
इस महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान में आप सभी सादर आमन्त्रित है ।